गुरुवार, 27 मार्च 2014

राधा और कृष्ण की प्रेमस्थली काम्यवन






प्रेमस्थली काम्यवन ब्रजमण्डल के द्वादशवनों में चतुर्थवन काम्यवन है। यह ब्रजमण्डल के सर्वोत्तम वनों में से एक है। इस वन की परिक्रमा करने वाला सौभाग्यवान व्यक्ति ब्रजधाम में पूजनीय होता है। इस वन के कामादि सरोवरों में स्नान करने मात्र से सब प्रकार की कामनाएं यहां तक कि कृष्ण की प्रेममयी सेवा की 
कामना भी पूर्ण हो जाती है। ब्रजमंडल का यह वन विविध प्रकार के सुरम्य-सरोवरों, कूपों, कुण्डों
वृक्ष-वल्लरियों, फूल और फलों से तथा विविध प्रकार के विहंगम दृश्यों से अतिशय सुशोभित है। 
यह श्रीकृष्ण की परम रमणीय विहार स्थली है। इसीलिए इसे काम्यवन कहा गया है।
विष्णु पुराण के अनुसार काम्यवन में चौरासी कुण्ड (तीर्थ), चौरासी मन्दिर तथा चौरासी खम्बे 
वर्तमान में हैं। कहते हैं कि इन सबकी प्रतिष्ठा किसी प्रसिद्ध राजा श्रीकामसेन के द्वारा की गई 
थी। ऐसी भी मान्यता है कि देवता और असुरों ने मिलकर यहां एक सौ अड़सठ(168) खम्बों का 
 निर्माण किया था।
कुण्ड और तीर्थ यहां छोटे-बड़े असंख्य कुण्ड और तीर्थ हैं। इस वन की परिक्रमा 14 मील की है। 
विमलकुण्ड यहां का प्रसिद्ध तीर्थ या कुण्ड है। सर्वप्रथम इस विमलकुण्ड में स्नान कर श्रीकाम्यवन 
के कुण्ड अथवा काम्यवन की दर्शनीय स्थलियों का दर्शन प्रारम्भ होता है। विमलकुण्ड के पश्चात 
गोपिका कुण्ड, सुवर्णपुर, गया कुण्ड एवं धर्म कुण्ड हैं। धर्म कुण्ड पर धर्मराज जी का सिंहासन दर्शनीय है। आगे यज्ञकुण्ड, पाण्डवों के पंचतीर्थ सरोवर, परम मोक्षकुण्ड, मणिकर्णिका कुण्ड हैं।
पास में ही निवासकुण्ड तथा यशोदा कुण्ड हैं। पर्वत के शिखर पर भद्रेश्वर शिवमूर्ति है। अनन्तर 
अलक्ष गरुड़ मूर्ति है। पास में ही पिप्पलाद ऋषि का आश्रम है। अनन्तर दिहुहली, राधापुष्करिणी और
 उसके पूर्व भाग में ललिता पुष्करिणी, उसके उत्तर में विशाखा पुष्करिणी, उसके पश्चिम में चन्द्रावली पुष्करिणी तथा दक्षिण भाग में चन्द्रभागा पुष्करिणी है, आगे कुशस्थली है। यहां शंखचूड़ बधस्थल तथा कामेश्वर 
महादेव जी दर्शनीय हैं। यहां से उत्तर में चन्द्रशेखर मूर्ति विमलेश्वर तथा वराह स्वरूप का दर्शन है। 
वहीं द्रोपदी के साथ पंच पाण्डवों का दर्शन, आगे वृन्दादेवी के साथ गोविन्दजी का दर्शन, श्रीराधावल्लभ,
श्रीगोपीनाथ, नवनीत राय, गोकुलेश्वर और श्रीरामचन्द्र के स्वरूपों का दर्शन है। इनके अतिरिक्त 
चरणपहाड़ी श्रीराधागोपीनाथ, श्रीराधामोहन (गोपालजी), चौरासी खम्बा आदि दर्शनीय स्थल हैं।
श्रीवृन्दादेवी और श्रीगोविन्ददेव यह काम्यवन का सर्वाधिक प्रसिद्ध मन्दिर है। यहां वृन्दादेवी का 
विशेष रूप से दर्शन है, जो ब्रजमण्डल में कहीं अन्यत्र दुर्लभ है। श्रीराधा-गोविन्ददेवी भी यहां 
विराजमान हैं। पास में ही श्रीविष्णु सिंहासन अर्थात श्रीकृष्ण का सिंहासन है। उसके निकट ही चरण 
कुण्ड है, जहां श्रीराधा और गोविन्द युगल के श्रीचरणकमल पखारे गये थे। श्रीरूप-सनातन आदि 
गोस्वामियों के अप्रकट होने के पश्चात धर्मान्ध मुगल सम्राट औरंगजेब के अत्याचारों से जिस समय 
ब्रज में वृन्दावन, मथुरा आदि के प्रसिद्ध मन्दिर ध्वंस किये जा रहे थे, उस समय जयपुर के परम 
भक्त महाराज ब्रज के श्रीगोविन्द, श्रीगोपीनाथ, श्रीमदनमोहन, श्रीराधादामोदर, श्रीराधामाधव आदि प्रसिद्ध
 विग्रहों को अपने साथ लेकर जब जयपुर आ रहे थे, तो उन्होंने मार्ग में इस काम्यवन में कुछ दिनों
 तक विश्राम किया। श्रीविग्रहों को रथों से यहां विभिन्न स्थानों में रुकवाकर उनका विधिवत स्नान
भोगराग और शयनादि सम्पन्न करवाया था। तत्पश्चात वे जयपुर और अन्य स्थानों में गये। 
तदनन्तर काम्यवन में जहां-जहां श्रीराधागोविन्द, श्रीराधागोपीनाथ और श्रीराधामदनमोहन रुके थे
उन-उन स्थानों पर विशाल मन्दिरों का निर्माण कराकर उनमें मूल श्रीविग्रहों की प्रतिभू-विग्रहों की 
प्रतिष्ठा की गई।
श्रीवृन्दादेवी काम्यवन तक तो आईं, किन्तु वे ब्रज को छोड़कर आगे नहीं गई। इसीलिए यहां 
श्रीवृन्दादेवी का पृथक रूप दर्शन है।
श्रीचैतन्य महाप्रभु और उनके श्रीरूप सनातन गोस्वामी आदि परिकरों ने ब्रजमण्डल की लुप्त 
 लीलास्थलियों को प्रकाशवान किया है। इनके ब्रज में आने से पूर्व काम्यवन को वृन्दावन माना 
जाता था। किन्तु श्रीचैतन्य महाप्रभु ने ही मथुरा के सन्निकट श्रीधाम वृन्दावन को प्रकाशित किया।
क्योंकि काम्यवन में यमुनाजी, चीरघाट, निधिवन, कालीदह, केशीघाट, सेवाकुंज, रासस्थली वंशीवट
श्रीगोपेश्वर महादेव की स्थिति असम्भव है। इसलिए विमलकुण्ड, कामेश्वर महादेव, चरणपहाड़ी
सेतुबांध रामेश्वर आदि लीला स्थलियां जहां विराजमान हैं, वह अवश्य ही वृन्दावन से अलग 
काम्यवन है। वृन्दादेवी का स्थान वृन्दावन में ही है। वे वृन्दावन के कुञ्ज की तथा उन कुञ्जों में 
श्रीराधाकृष्ण युगल की क्रीड़ाओं की अधिष्ठात्री देवी है। अत: अब वे श्रीधाम वृन्दावन के श्रीरूप 
सनातन गौड़ीय मठ में विराजमान हैं। यहां उनकी बड़ी ही दिव्य झंकी है। श्रीगोविन्द मन्दिर के 
 निकट ही गरुड़जी, चन्द्रभाषा कुण्ड, चन्द्रेश्वर महादेवजी, वाराहकुण्ड, वाराहकूप, यज्ञकुण्ड और 
धर्मकुण्डादि दर्शनीय हैं।
चरणपहाड़ी श्रीकृष्ण इस कन्दरा में प्रवेशकर पहाड़ी के ऊपर प्रकट हुए और वहीं से उन्होंने मधुर 
वंशी ध्वनि की। वंशीध्वनि सुनकर सखियों का ध्यान टूट गया और उन्होंने पहाड़ी के ऊपर प्रियतम 
को वंशी बजाते हुए देखा। वे दौड़कर वहां पर पहुंची और बड़ी आतुरता के साथ कृष्ण से मिलीं। वंशी ध्वनि से पर्वत पिघल जाने के कारण उसमें श्रीकृष्ण के चरण चिह्न् उभर आये। आज भी वे चरण-चिह्न् 
स्पष्ट रूप में दर्शनीय हैं। पास में उसी पहाड़ी पर जहां बछ़डे चर रहे थे और सखा खेल रहे थे, उसके
 पत्थर भी पिघल गये, जिस पर उन बछड़ों और सखाओं के चरण-चिह्न् अंकित हो गये, जो पांच 
हजार वर्ष बाद आज भी स्पष्ट रूप से दर्शनीय हैं। लुक-लुकी कुण्ड में जल-क्रीड़ा हुई थी। इसलिए 
इसे जल-क्रीड़ा कुण्ड भी कहते हैं।




विमल कुण्ड -

धर्म कुण्ड यह कुण्ड काम्यवन की पूर्व दिशा में हैं। यहां श्रीनारायण धर्म के रूप में विराजमान हैं।
 पास में ही विशाखा नामक वेदी है। श्रवणा नक्षत्र, बुधवार, भाद्रपद कृष्णाष्टमी में यहां स्नान की 
विशेष विधि है।
यशोदा कुण्ड काम्यवन में यहीं कृष्ण की माता श्रीयशोदाजी का पित्रालय था। श्रीकृष्ण बचपन में 
अपनी माता जी के साथ यहां कभी-कभी आकर निवास करते थे।
कभी-कभी नन्द गोकुल अपने गऊओं के साथ पड़ाव में यहीं ठहरते थे।
श्रीकृष्ण सखाओं के साथ यहां गोचारण भी करते थे। ऐसा शास्त्रों में उल्लेख है। यह स्थान 
अत्यन्त मनोहर है।
प्रयाग कुण्ड तीर्थराज प्रयाग ने यहां श्रीकृष्ण की आराधना की थी। प्रयाग और पुष्कर ये दोनों 
कुण्ड एक साथ हैं।
द्वारका कुण्ड श्रीकृष्ण ने यहां पर द्वारका से ब्रज में पधारकर महर्षियों के साथ शिविर बनाकर 
निवास अवस्थित किया था। द्वारकाकुण्ड, सोमती कुण्ड, मानकुण्ड और बलभद्र कुण्ड, ये चारों कुण्ड 
परस्पर निकट उपस्थित हैं।
नारद कुण्ड यह नारदजी की आराधना स्थली है। देवर्षि नारद इस स्थान पर कृष्ण की मधुर 
लीलाओं का गान करते हुए अधैर्य हो जाते थे।
मनोकामना कुण्ड विमल कुण्ड और यशोदा कुण्ड के बीच में मनोकामना कुण्ड और काम सरोवर 
एक साथ विराजमान हैं। यहां स्नानादि करने पर मन की सारी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। 
काम्यवन में गोपिकारमण कामसरोवर है, जहां पर मन में जन्म लेने वाली शुभेच्छाएं पूरी होती हैं। उसी काम्यवन में अन्यान्य सहस्त्र तीर्थ विराजमान हैं।
सेतुबन्ध सरोवर श्रीकृष्ण ने यहां पर श्रीरामावेश में गोपियों के कहने से बंदरों के द्वारा सेतु का 
निर्माण किया था। अभी भी इस सरोवर में सेतु बन्ध के भग्नावशेष दर्शनीय हैं। कुण्ड के उत्तर 
में रामेश्वर महादेवजी दर्शनीय हैं। जो श्रीरामावेशी श्रीकृष्ण के द्वारा प्रतिष्ठित हुए थे। कुण्ड के 
दक्षिण में उस पार एक टीले के रूप में लंकापुरी भी दर्शनीय है।
प्रसंग श्रीकृष्ण लीला के समय एक दिन परम कौतुकी श्रीकृष्ण इसी कुण्ड के उत्तरी तट पर 
गोपियों के साथ वृक्षों की छाया में बैठकर विनोदिनी श्रीराधिका के साथ हास-परिहास कर रहे थे। 
उस समय इनकी रूप माधुरी से आकृष्ट होकर आस-पास के सारे बंदर पेड़ों से नीचे उतरकर 
उनके चरणों में प्रणामकर किलकारियां मारकर नाचने-कूदने लगे। बहुत से बंदर कुण्ड के दक्षिण 
तट के वृक्षों से लम्बी छलांग मारकर उनके चरणों के समीप पहुंचे। भगवान श्रीकृष्ण उन बंदरों 
की वीरता की प्रशंसा करने लगे। गोपियां भी इस आश्चर्यजनक लीला को देखकर मुग्ध हो गईं। वे
 भी भगवान श्रीरामचन्द्र की अद्भुत लीलाओं का वर्णन करते हुए कहने लगीं कि श्रीरामचन्द्रजी ने 
भी बंदरों की सहायता ली थी। उस समय ललिताजी ने कहा- हमने सुना है कि महापराक्रमी 
हनुमान जी ने त्रेतायुग में एक छलांग में समुद्र को पार कर लिया था। परन्तु आज तो हम 
साक्षात रूप में बंदरों को इस सरोवर को एक छलांग में पार करते हुए देख रहे हैं। ऐसा सुनकर 
कृष्ण ने गर्व करते हुए कहा- जानती हो ! मैं ही त्रेतायुग में श्रीराम था, मैंने ही रामरूप में सारी 
लीलाएं की थी।
ललिता श्रीरामचन्द्र की अद्भुत लीलाओं की प्रशंसा करती हुई बोलीं- तुम झूठे हो। तुम कदापि राम 
नहीं थे। तुम्हारे लिए कदापि वैसी वीरता सम्भव नहीं। श्रीकृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा- तुम्हें 
विश्वास नहीं हो रहा है, किन्तु मैंने ही रामरूप धारण कर जनकपुरी में शिवधनु को तोड़कर सीता 
से विवाह किया था। पिता के आदेश से धनुष-बाण धारणकर सीता और लक्ष्मण के साथ चित्रकूट 
और दण्डकारण्य में भ्रमण किया तथा वहां अत्याचारी दैत्यों का विनाश किया। फिर सीता के 
वियोग में वन-वन भटका। पुन: बन्दरों की सहायता से रावण सहित लंकापुरी का ध्वंसकर 
 अयोध्या में लौटा। मैं इस समय गोपालन के द्वारा वंशी धारणकर गोचारण करते हुए वन-वन 
में भ्रमण करता हुआ प्रियतमा श्रीराधिका के साथ तुम गोपियों से विनोद कर रहा हूं।
ललिताजी ने भी मुस्कराते हुए कहा- हम केवल कोरी बातों से ही विश्वास नहीं कर सकतीं। यदि 
श्रीराम जैसा कुछ पराक्रम दिखा सको तो हम विश्वास कर सकती हैं। श्रीरामचन्द्रजी सौ योजन 
समुद्र को भालू-कपियों के द्वारा बंधवाकर सारी सेना के साथ उस पार गये थे। आप इन बंदरों के 
द्वारा इस छोटे से सरोवर पर पुल बंधवा दें तो हम विश्वास कर सकती हैं। ललिता की बात 
सुनकर श्रीकृष्ण ने वेणू-ध्वनि के द्वारा क्षणमात्र में सभी बंदरों को एकत्र कर लिया तथा उन्हें 
प्रस्तर शिलाओं के द्वारा उस सरोवर के ऊपर सेतु बांधने के लिए आदेश दिया। देखते ही देखते 
श्रीकृष्ण के आदेश से हजारों बंदर बड़ी उत्सुकता के साथ दूर -दूर स्थानों से पत्थरों को लाकर सेतु 
निर्माण लग गये। श्रीकृष्ण ने अपने हाथों से उन बंदरों के द्वारा लाये हुए उन पत्थरों के द्वारा 
सेतु का निर्माण किया। सेतु के प्रारम्भ में सरोवर की उत्तर दिशा में श्रीकृष्ण ने अपने रामेश्वर 
महादेव की स्थापना भी की। आज भी ये सभी लीलास्थान दर्शनीय हैं। इस कुण्ड का नामान्तर 
लंका कुण्ड भी है।
लुकलुकी कुण्ड गोचारण करते समय कभी कृष्ण अपने सखाओं को खेलते हुए छोड़कर कुछ समय 
के लिए एकान्त में इस परम रमणीय स्थान पर गोपियों से मिले। वे उन ब्रज रमणियों के साथ 
यहां पर लुका-छिपी (आंख मुदउवल) की क्रीड़ा करने लगे। सब गोपियों ने अपनी-अपनी आंखें मूंद
 लीं और कृष्ण निकट ही पर्वत की एक कन्दरा में प्रवेश कर गये। सखियां चारों ओर खोजने 
लगीं, किन्तु कृष्ण को ढूंढ नहीं सकीं। वे बहुत ही चिन्तित हुईं कि कृष्ण हमें छोड़कर कहां चले 
गये? वे कृष्ण का ध्यान करने लगीं। जहां पर वे बैठकर ध्यान कर रही थीं, वह स्थल ध्यान-कुण्ड 
है। जिस कन्दरा में कृष्ण छिपे थे, उसे लुक- लुक कन्दरा कहते हैं।
फिसलनी शिला कलावता ग्राम के पास में इन्द्रसेन पर्वत पर फिसलनी शिला विद्यमान है।
गोचारण करने के समय श्रीकृष्ण सखाओं के साथ यहां फिसलने की क्रीड़ा करते थे। यात्री भी इस
 क्रीड़ा कौतुकवाली शिला के दर्शन करने के लिए जाते हैं।
काम्यवन ग्राम से कुछ दूर दक्षिण-पश्चिम कोण में प्रसिद्ध विमल कुण्ड स्थित है। कुण्ड के चारों 
ओर क्रमश: (1) दाऊजी, (2) सूर्यदेव, (3) श्रीनीलकंठेश्वर महादेव, (4) श्रीगोवर्धननाथ, (5) श्रीमदन मोहन
 एवं काम्यवन विहारी, (6) श्रीविमल विहारी, (7) विमला देवी, (8) श्रीमुरलीमनोहर, (9) भगवती गंगा 
और (10) श्रीगोपालजी विराजमान हैं।


गया कुण्ड-

गयातीर्थ भी ब्रजमण्डल के इस स्थान पर रहकर कृष्ण की आराधना करते हैं।
इसमें अगस्त कुण्ड भी एक साथ मिले हुए हैं। गया कुण्ड के दक्षिणी घाट का नाम अगस्त घाट है।
 यहां आश्विन माह के कृष्ण पक्ष में स्नान, तर्पण और पिण्डदान आदि प्रशस्त हैं।
विहृल कुण्ड चरणपहाड़ी के पास ही विहृल कुण्ड और पञ्चसखा कुण्ड है। यहां पर कृष्ण की मुरली 
ध्वनि को सुनकर गोपियां प्रेम में विहृल हो गईं थीं। इसलिए वह स्थान विहृल कुण्ड के नाम से 
प्रसिद्ध हुआ। पञ्च सखा कुण्डों के नाम रंगीला, छबीला, जकीला, मतीला और दतीला कुण्ड हैं। ये 
सब अग्रावली ग्राम के पास विद्यमान हैं।




काम्यवन के दरवाजे-
काम्यवन में सात दरवाजे हैं डीग दरवाजा काम्यवन के अग्नि कोण में (दक्षिण-पूर्व दिशा में) 
अवस्थित है। यहां से डीग (दीर्घपुर) और भरतपुर जाने का रास्ता है।
लंका दरवाजा काम्यवन गांव के दक्षिण कोण में अवस्थित है।
यहां से सेतुबन्ध कुण्ड की ओर जाने का मार्ग है।
आमेर दरवाजा काम्यवन गांव के नैऋत्य कोण में (दक्षिण-पश्चिम दिशा में) अवस्थित है। यहां से 
चरणपहाड़ी जाने का मार्ग है।
देवी दरवाजा काम्यवन गांव के पश्चिम में अवस्थित है। यहां से वैष्णवीदेवी (पंजाब) जाने का 
मार्ग है।
दिल्ली दरवाजा काम्यवन के उत्तर में अवस्थित है। यहां से दिल्ली जाने का मार्ग है।
रामजी दरवाजा गांव के ईशान कोण में अवस्थित है। यहां से नन्दगांव जाने का मार्ग है।
मथुरा दरवाजा गांव के पूर्व में अवस्थित है। यहां से बरसाना होकर मथुरा जाने का मार्ग है।





व्योमासुर गुफा-

इसके पास ही पहाड़ी के मध्य में व्योमासुर की गुफा है। यहीं पर कृष्ण ने व्योमासुर का वध किया 
था। इसे मेधावी मुनि की कन्दरा भी कहते हैं। मेधावी मुनि ने यहां कृष्ण की आराधना की थी। पास
 में ही पहाड़ी के नीचे श्रीबलदेव प्रभु का चरणचिह्न् है। जिस समय श्रीकृष्ण व्योमासुर का वध कर 
रहे थे, उस समय पृथ्वी कांपने लगी। बलदेव जी ने अपने चरणों से पृथ्वी को दबाकर शान्त कर 
दिया था। उन्हीं के चरणों का चिह्न् आज भी दर्शनीय है।



श्री प्रबोधानन्द सरस्वती भजन स्थली
श्री प्रबोधानन्द सरस्वती भजन स्थली लुकलुकी कुण्ड के पास ही बड़े ही निर्जन किन्तु सुरम्य 
स्थान में श्रीप्रबोधानन्दजी की भजन-स्थली है। श्रीप्रबोधानन्द, श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी के गुरू एवं 
पितृव्य थे। ये सर्वशास्त्रों के पारंगत अप्राकृत कवि थे। राधारससुधानिधि, श्रीनवद्वीप शतक
श्रीवृन्दावन शतक आदि इन्हीं महापुरुष की कृतियां हैं। श्रीकविकर्णपूर ने अपने प्रसिद्ध 
 गौरगणोद्देशदीपिका में उनको कृष्णलीला की अष्टसखियों में सर्वगुणसम्पन्ना तुंगविद्या सखी 
बतलाया है। श्रीरंगम में श्रीमन्महाप्रभु से कुछ कृष्ण कथा श्रवणकर ये श्रीसम्प्रदाय को छोड़कर 
श्रीमन्महाप्रभु के अनुगत हो गये। श्रीमन्महाप्रभु के श्रीरंगम से प्रस्थान करने पर ये वृन्दावन में 
उपस्थित हुए और कुछ दिनों तक यहां इस निर्जन स्थान में रहकर उन्होंने भजन किया था।
अपने अन्तिम समय में श्रीवृन्दावन कालीदह के पास भजन करते-करते नित्यलीला में प्रविष्ट हुए। आज भी उनकी भजन और समाधि स्थली वहां दर्शनीय है।
भोजन थाली व्योमासुर गुफा से थोड़ी दूर भोजन थाली है। श्रीकृष्ण ने व्योमासुर का वधकर यहीं 
पर इस कुण्ड में सखाओं के साथ स्नान किया था, उस कुण्ड को क्षीरसागर या कृष्णकुण्ड कहते हैं। इस कुण्ड के ऊपर कृष्ण ने सब गोप सखाओं के साथ भोजन किया था। भोजन करने के स्थल में अभी भी 
पहाड़ी में थाल और कटोरी के चिह्न् विद्यमान हैं। पास में ही श्रीकृष्ण के बैठने का सिंहासन 
स्थल भी विद्यमान है। भोजन करने के पश्चात कुछ ऊपर पहाड़ी पर सखाओं के साथ क्रीड़ा 
कौतुक का स्थल भी विद्यमान है। सखालोग एक शिला को वाद्ययन्त्र के रूप में व्यवहार करते 
थे। आज भी उस शिला को बजाने से नाना प्रकार के मधुर स्वर निकलते हैं। यह बाजन शिला के
 नाम से प्रसिद्ध है। पास में ही शान्तु की तपस्या स्थली शान्तनुकुण्ड है, जिसमें गुप्तगंगा 
नैमिषतीर्थ, हरिद्वार कुण्ड, अवन्तिका कुण्ड, मत्स्य कुण्ड, गोविन्द कुण्ड, नृसिंह कुण्ड और प्रह्लाद 
कुण्ड ये एकत्र विद्यमान हैं।
भोजन स्थली की पहाड़ी पर श्रीपरशुरामजी की तपस्या स्थली है। यहां पर श्रीपरशुरामजी ने भगवद आराधना की थी।
काम्यवन में श्रीगौड़ीय सम्प्रदाय के विग्रह-श्रीगोविन्दजी, श्रीवृन्दाजी, श्रीगोपीनाथजी और 
श्रीमदनमोहनजी हैं।
श्रीवल्लभ सम्प्रदाय के विग्रह श्रीकृष्णचन्द्रमाजी, नवनीतप्रियाजी और श्रीमदनमोहनजी हैं।

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Source – KalpatruExpress News Papper


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